Wednesday, 19 November 2014

In conversation with God


















जीवन की राह पर चलते चलते पहुंचा वहाँ
एक झील थी और अर्ध विराम का चिन्ह लगा था जहां

सोचा थोड़ा विश्राम कर लूँ
और थोड़ा विचार कर लूँ

जीवन की रह पर क्या खोया क्या पाया
झील की तरफ बड़ा, ज्यों झुका देखा एक साया

मुरझाया चेहरा, ढलकी मांसपेशियां
सफ़ेद बाल, आँखों तले झुर्रियां



कौन हो तुम, पूछा मैंने
आवाज़ आई
अपने आप को नहीं पहचानते

क्यों व्यंग करते हो
मैं सुन्दर बलशाली शरीर का स्वामी
तेज झलकता चेहरा मेरा
आँखों में कुछ कर दिखने की चमक
नहीं हो सकता यह प्रतिबिम्ब मेरा

                       निकलो भ्रम से प्राणी,
                       यह है जीवन का अर्ध विराम
                       शक्ति सुंदरता का आज से  नाश होगा
                       और जिस दिन हो जायेगा शरीर ऊर्जा विहीन
                       वह दिन होगा जीवन का पूर्ण विराम
                       यही है विधि का विधान

पर मेरे कार्य पड़े हैं कितने अधूरे
सपने करने हैं कितने साकार
और समय पाना चाहता हूँ मैं
दुबारा जीना चाहता हूँ मैं

                       तुम्हारा शरीर भोग चूका
                       जीवन के रस सारे
                       जो कर्म किये थे
                       लिख दिए भाग्य में तुम्हारे
                       अब इस पाप का बोझ  ले कर
                       आगे बड़ो जीवन की राह पर

माना मुझ से गलतियां हुईं हैं
जहां आसान लगा झूठ अधर्म को अपनाया
कुछ पुण्य आत्माओं को भी है दुखाया
जीवन के लेखे जोखे से
यह सब मिटाना चाहता हूँ मैं
दुबारा जीना चाहता हूँ मैं

                     अवसर दिया तुम्हे और, करो सपने साकार
                     पश्चाताप में पुण है जान ले यह संसार
                    तुम्हारा ही एक अंश ले के बना दी मैंने काया
                    प्राण भी डाल दिए उसमें देखो मेरी माया

इतनी की कृपा, कृतज्ञ हूँ मैं  भगवान
इस शरीर का अब हो भी जाये पूर्ण विराम
संसार में रहेगा फिर भी मेरा नाम
रहेगी शक्ति मेरी, महत्वकांशा मेरी
मेरे सपने
मेरा तेज
मेरा लक्ष्मणय

written on W.O.Noroc 23 March 2006









 

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